आईना (गुलज़ार)


ये आईना बोलने लगा है,
मैं जब गुज़रता हूं सीढ़ियों से,
ये बातें करता है- आते जाते में पूछता है
"कहाॅं गयी वह फतुई तेरी--
ये कोट नेक-टाई तुझ पे फबती नहीं,
ये मसनूई लग रही है--"

ये मेरी सूरत पे नुकताचीनी तो ऐसे करता है
जैसे मैं उसका अक्स हूॅं --
और वो जायज़ा ले रहा है मेरा।
"तुम्हारा माथा कुशादा होने लगा है लेकिन,
 तुम्हारे 'आइब्रो' सिकुड़ रहे हैं--
तुम्हारी ऑंखों का फ़ासला कमता जा रहा है--
तुम्हारे माथे की बीच वाली शिकन बहुत गहरी हो गयी है--"

कभी कभी बेतकल्लुफ़ी से बुला के कहता है!
"यार भोलू-----
तुम अपने दफ़्तर की मेज़ की दाहिनी तरफ़ की दराज़ में
रख के भूल आये हो मुस्कुराहट,
जहॉं पे पोशीदा एक फ़ाइल रखी थी तुमने
वो मुस्कुराहट भी अपने होंठों पे चस्पाॅं कर लो"

इस आईने को पलट के दीवार की तरफ़ भी लगा चुका हूॅं--
ये चुप तो हो जाता है मगर फिर भी देखता है--
ये आईना देखता बहुत है!
ये आईना बोलता बहुत है!!

- गुलज़ार