धूल


(१) 
तुम धूल हो— 
पैरों से रौंदी हुई धूल। 

बेचैन हवा के साथ उठो, 
आँधी बन 
उनकी आँखों में पड़ो 
जिनके पैरों के नीचे हो। 

ऐसी कोई जगह नहीं 
जहाँ तुम पहुँच न सको, 
ऐसा कोई नहीं 
जो तुम्हें रोक ले। 

तुम धूल हो 
पैरों में रौंदी हुई धूल, 
धूल से मिल जाओ। 

(२)
तुम धूल हो
ज़िंदगी की सीलन से दीमक बनो।

रातों-रात
सदियों से बंद इन दीवारों की
खिड़कियाँ दरवाज़े
और रोशनदाल चाल दो।

तुम धूल हो
ज़िंदगी की सीलन से जन्म लो
दीमक बनो, आगे बढ़ो।

एक बार रास्ता पहचान लेने पर
तुम्हें कोई ख़त्म नहीं कर सकता।

-सर्वेश्वरदयाल सक्सेना