लोहे की रेलिंग (नरेश सक्सेना)
By Siddhant Shekhar Singh
थोड़ी-सी ऑक्सीजन और थोड़ी-सी नमी
वह छीन लेती है हवा से
और पेंट की परत के नीचे छिपकर
एक ख़ुफ़िया कार्रवाई की शुरुआत करती है
एक दिन अचानक
एक पपड़ी छिलके-सी उतरती है
और चुटकी भर भुरभुरा लाल चूरा
चुपके से धरती की तरफ़
लगाता है छलाँग
(गुरुत्त्वाकर्षण इसमें उसकी मदद करता है)
यह शिल्प और तकनीकी के जबड़ों से
छूटकर आज़ाद होने की
जी तोड़ कोशिश
यह घर लौटने की एक मासूम इच्छा
आख़िर थोड़ी-सी ऑक्सीजन और
थोड़ी-सी नमी
तो हमें भी ज़रूरी है ज़िंदा रहने के लिए
बस थोड़ी-सी ऑक्सीजन
और थोड़ी-सी नमी
वह भी छीन लेती है हवा से।
स्रोत :पुस्तक : समुद्र पर हो रही है बारिश
रचनाकार : नरेश सक्सेना
प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन
संस्करण : 2001