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धूल

(१) तुम धूल हो— पैरों से रौंदी हुई धूल। बेचैन हवा के साथ उठो, आँधी बन उनकी आँखों में पड़ो जिनके पैरों के नीचे हो। ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ तुम पहुँच न सक...

By Rachnakaron ki Mehfil

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काँक्रीट(नरेश सक्सेना)

काँक्रीट(नरेश सक्सेना)

आपस में सट कर फूटी कलियाँ एक दूसरे के खिलने के लिए जगह छोड़ देती हैं जगह छोड़ देती हैं गिट्टियाँ आपस में चाहे जितना सटें अपने बीच अपने बराबर जगह ख़ाली...

By Rachnakaron ki Mehfil

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आईना (गुलज़ार)

आईना (गुलज़ार)

ये आईना बोलने लगा है,मैं जब गुज़रता हूं सीढ़ियों से,ये बातें करता है- आते जाते में पूछता है"कहाॅं गयी वह फतुई तेरी--ये कोट नेक-टाई तुझ पे फबती नहीं,ये...

By Rachnakaron ki Mehfil

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चाँदनी की पाँच परतें(सर्वेश्वर दयाल सक्सेना)

चाँदनी की पाँच परतें(सर्वेश्वर दयाल सक्सेना)

चाँदनी की पाँच परतें,हर परत अज्ञात हैएक जल में,एक थल में,एक नीलाकाश मेंएक आँखों में तुम्हारे झिलमिलाती,एक मेरे बन रहे विश्वास मेंक्या कहूँ, कैसे कहूँक...

By Rachnakaron ki Mehfil

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तुमसे अलग होकर

तुमसे अलग होकर

तुमसे अलग होकर लगता हैअचानक मेरे पंख छोटे हो गए हैं,और मैं नीचे एक सीमाहीन सागर में गिरता जा रहा हूँ।अब कहीं कोई यात्रा नहीं है,न अर्थमय, न अर्थहीन;गि...

By Rachnakaron ki Mehfil

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तुम्हारे साथ रहकर

तुम्हारे साथ रहकर

तुम्हारे साथ रहकर अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है कि दिशाएँ पास आ गई हैं, हर रास्ता छोटा हो गया है, दुनिया सिमटकर एक आँगन-सी बन गई है जो खचाखच भरा है, कही...

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कायनात

कायनात

बस चन्द करोड़ों सालों में सूरज की आग बुझेगी जब और राख उड़ेगी सूरज से जब कोई चाँद न डूबेगा और कोई जमीं न उभरेगी तब ठंढा बुझा इक कोयला सा टुकड़ा ये जमीं...

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मरना

मरना

आदमी मरने के बाद कुछ नहीं सोचता आदमी मरने के बाद कुछ नहीं बोलता कुछ नहीं सोचने और कुछ नहीं बोलने पर आदमी मर जाता है - उदय प्रकाश

By Rachnakaron ki Mehfil

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फूल काॅलर पे बस लगाना है

फूल कॉलर पे बस लगाना है कितना आसान मुस्कुराना है झूलती है कमान पर चिड़िया और तरकश में आशियाना है पड़ गई है ज़बान उलझन में जो छुपाना है वो बताना है हम...

By Rachnakaron ki Mehfil

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वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है

वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान हैमाथे पे उस के चोट का गहरा निशान हैवो कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगूमैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान हैसामान कुछ...

By Rachnakaron ki Mehfil

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गमले में आदमी

जड़ें धरती से जोड़ने की इच्छा,आकाश छूने की इच्छा,बाहें फैलाने की इच्छाऔर हवा के साथ गाने की इच्छा,इस तरह से जन्म लेता हैएक पेड़, एक फूल और फल।यूँ तो ध...

By Rachnakaron ki Mehfil

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जागती हैं रात भर क्यों

जागती हैं रात भर क्यों,ये भरी आँखें तुम्हारी!क्या कहीं दिन मेंतड़पता स्वप्न देखासुई जैसी चुभ गई क्याहस्त-रेखाबात क्या थीक्यों डरी आँखें तुम्हारी।जागती...

By Rachnakaron ki Mehfil

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हम जिएँ न जिएँ दोस्त

हम जिएँ न जिएँ दोस्त

हम जिएँ न जिएँ दोस्त तुम जियो एक नौजवान की तरह, खेत में झूम रहे धान की तरह, मौत को मार रहे बान की तरह। हम जिएँ न जिएँ दोस्त तुम जियो अजेय इंसान की तरह...

By Rachnakaron ki Mehfil

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बात सीधी थी पर

बात सीधी थी पर एक बार भाषा के चक्कर में ज़रा टेढ़ी फँस गई। उसे पाने की कोशिश में भाषा को उलटा पलटा तोड़ा मरोड़ा घुमाया फिराया कि बात या तो बने या फिर भाषा...

By Rachnakaron ki Mehfil

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Random Thought

Your website is just like a first date; if it is slow, outdated and confusing ; you might never get a second chance.

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दीप्ति मिश्रा

दीप्ति मिश्रा

दूर थे और दूर हैं हर दम ज़मीन-ओ-आसमाँ दूरियों के बा'द भी दोनों में क़ुर्बत है तो है

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