धूल (१) तुम धूल हो— पैरों से रौंदी हुई धूल। बेचैन हवा के साथ उठो, आँधी बन उनकी आँखों में पड़ो जिनके पैरों के नीचे हो। ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ तुम पहुँच न सको, ऐसा कोई... Read More →
बात सीधी थी पर बात सीधी थी पर एक बार भाषा के चक्कर में ज़रा टेढ़ी फँस गई। उसे पाने की कोशिश में भाषा को उलटा पलटा तोड़ा मरोड़ा घुमाया फिराया कि बात या तो बने या फिर भाषा से बाहर आ... Read More →
हम जिएँ न जिएँ दोस्त हम जिएँ न जिएँ दोस्त तुम जियो एक नौजवान की तरह, खेत में झूम रहे धान की तरह, मौत को मार रहे बान की तरह। हम जिएँ न जिएँ दोस्त तुम जियो अजेय इंसान की तरह मरण के इस... Read More →
जागती हैं रात भर क्यों जागती हैं रात भर क्यों,ये भरी आँखें तुम्हारी!क्या कहीं दिन मेंतड़पता स्वप्न देखासुई जैसी चुभ गई क्याहस्त-रेखाबात क्या थीक्यों डरी आँखें तुम्हारी।जागती हैं रात भ... Read More →
गमले में आदमी जड़ें धरती से जोड़ने की इच्छा,आकाश छूने की इच्छा,बाहें फैलाने की इच्छाऔर हवा के साथ गाने की इच्छा,इस तरह से जन्म लेता हैएक पेड़, एक फूल और फल।यूँ तो धरती कम न थ... Read More →
वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान हैमाथे पे उस के चोट का गहरा निशान हैवो कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगूमैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान हैसामान कुछ नहीं है फट... Read More →